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भारतीय संविधान आणि इतिहास - २० प्रश्न
भारतीय संविधान आणि इतिहास - २० प्रश्न
*अमृतलाल विठ्ठलदास ठक्कर*
( ठक्कर बाप्पा )
*जन्म : 29 नवंबर 1869*
(भावनगर, गुजरात)
*मृत्यु : 20 जनवरी 1951*
उपाधी : ठक्कर बाप्पा
पिता- विट्ठलदास लालजी ठक्कर
माता : मुलीबाई
कर्म भूमि : भारत
कर्म-क्षेत्र : समाज सेवक
नागरिकता : भारतीय
संबंधित लेख : महात्मा गाँधी, गोपाल कृष्ण गोखले
विशेष : ठक्कर बाप्पा ने 1914 में ‘भारत सेवक समाज’ के संस्थापक गोपालकृष्ण गोखले से समाज सेवा की दीक्षा ली और जीवनपर्यंत लोक-सेवा में ही लगे रहे। इसी कारण वे ठक्कर बाप्पा के नाम से प्रसिद्ध हुए।
अन्य जानकारी : गाँधी जी की प्रेरणा से ‘अस्पृश्यता निवारण संघ’, जो बाद में ‘हरिजन सेवक संघ’ कहलाया, बना तो ठक्कर बाप्पा उसके मंत्री बनाए गए। 1933 में जब हरिजन कार्य के लिए गाँधी जी ने पूरे देश का भ्रमण किया तो ठक्कर बाप्पा उनके साथ थे।
ठक्कर बापा, गांधी जी के बहुत करीब रहे थे। वे सन 1914-15 से गांधीजी के सम्पर्क में आए थे। मगर, तब भी वे अपने लोगों के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद, आदिवासियों की अधिसंख्य आबादी आज भी बीहड़ जंगलों में रहने अभिशप्त है। अपने देश और समाज के प्रति ठक्कर बापा की नीयत साफ झलकती है। मगर, आदिवासियों के प्रति कांग्रेस की नीतियां में जरुर संदेह नजर आता हैं।
ठक्कर बापा का नाम लेते ही ऐसे ईमानदार शख्स की तस्वीर जेहन में उभरती है, जो बड़ा ईमानदार है। जिसने एक बड़े सरकारी ओहदे से इस्तीफा देकर दिन-हीन और लाचार लोगों के लिए अपनी तमाम जिंदगी न्योछावर कर दी हो। शायद, इसी को लक्ष्य कर गांधी जी ने एक उन्हें 'बापा ' कहा था। 'बापा ' अर्थात लाचार और असहायों का बाप। चाहे गुजरात का भीषण दुर्भिक्ष हो या नोआखाली के दंगे, ठक्कर बापा ने लोगोंकी जो सेवा की , नि:संदेह वह स्तुतिय है।
ठक्कर बापा एक खाते-पीते परिवार से संबंध रखते थे। ठक्कर बापा का नाम अमृतलाल ठक्कर था। आपका जन्म 29 नवम्बर 1869 भावनगर (सौराष्ट्र ) में हुआ था। आप की माता का नाम मुलीबाई और पिता का नाम विठलदास ठक्कर था। अमृतलाल ठक्कर के पिताजी एक व्यवसायी थे। विट्ठलदास समाज के हितेषी और स्वभाव से दयालु थे।उन्होंने अपने गरीब समाज के बच्चों के लिए भावनगर में एक छात्रावास खोला था। भावनगर में ही सन 1900 के भीषण अकाल में उन्होंने केम्प लगवा कर कई राहत कार्य चलवाए थे।
पढने-लिखने में अमृतलाल बचपन से ही होशियार थे। सन 1886 में आपने मेट्रिक में टॉप किया था। सन 1890 में आपने पूना से सिविल इंजीनियरिंग पास किया था। सन 1890 -1900 की अवधि में अमृतलाल ठक्कर ने काठियावाड़ स्टेट में कई जगह नौकरी की थी। सन 1900-1903 के दौरान पूर्वी अफ्रीका के युगांडा रेलवे में बतौर इंजिनीयर उन्होंने अपनी सेवा दी। वे सांगली स्टेट के चीफ इंजिनियर नियुक्त हुए। इसी समय आप गोपाल कृष्ण गोखले और धोंडो केशव कर्वे के सम्पर्क में आए।
सांगली में एकाध साल नौकरी करने के बाद अमृतलाल ठक्कर बाम्बे म्युनिसिपल्टी में आ गए। यहाँ कुर्ला में नौकरी के दौरान वे वहाँ की दलित बस्तियों में गए। डिप्रेस्ड कास्ट मिशन के रामजी शिंदे के सहयोग से उन बस्तियों में आपने स्वीपर बच्चों के लिए स्कूल खोला ।
सन 1914 में अमृतलाल ठक्कर ने अपने नौकरी से त्याग दे दिया। अब वे 'सर्वेंट ऑफ़ इंडिया सोसायटी' से जुड़ कर पूरी तरह जन-सेवा में जुट गए। यही वह समय था जब गोपाल कृष्ण गोखले ने उनकी मुलाकात गांधी जी से करवाई। सन 1915 -16 में ठक्कर बापा ने बाम्बे के स्वीपरों के लिए को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की। इसी तरह अहमदाबाद में आपने मजदूर बच्चों के लिए स्कूल खोला।
सन 1918-19 की अवधि में टाटा आयरन एंड स्टील जमशेदपुर ने अपने कामगारों की परिस्थितियों के आंकलन के लिए ठक्कर बापा की सेवाएं ली थी। गुजरात और उड़ीसा में पड़े भीषण अकाल के समय ठक्कर बाबा ने वहाँ रिलीफ केम्प लगा कर काफी काम किया। सन 1922 -23 के अकाल में गुजरात में भीलों के बीच रिलीफ का कार्य करते हुए आपने 'भील सेवा मंडल' स्थापित किया था।
सन 1930 में सिविल अवज्ञा आंदोलन दौरान वे गिरफ्तार हुए थे। उन्हें 40 दिन जेल में रहना पड़ा था। पूना पेक्ट (सन 1932 )में गांधी जी के आमरण अनशन के दौरान ठक्कर बापा ने समझौए के लिए महती भूमिका निभाई थी।
ठक्कर बापा ने बतौर 'हरिजन सेवक संघ' के महासचिव सन 1934 -1937 की अवधि में ' हरिजनों ' की समस्याओं से रुबरूं होने के लिए सारे देश का भमण किया था। सन 1938-42 की अवधि में वे सी पी एंड बरार, उड़ीसा, बिहार, बाम्बे राज्यों में आदिवासी और पिछड़े वर्गों के कल्याण से संबंधित विभिन्न सरकारी समितियों में रहे थे ।
सन 1944 में ठक्कर बापा ने 'कस्तूरबा गांधी नॅशनल मेमोरियल फण्ड' की स्थापना की। इसी वर्ष ' गोंड सेवक संघ' जो अब 'वनवासी सेवा मंडल' के नाम से जाना जाता है; की स्थापना की थी। ठक्कर बापा सन 1945 में 'महादेव देसाई मेमोरियल फण्ड' के महासचिव बने थे। 'आदिमजाति मंडल' रांची जिसके अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद थे, के उपाध्यक्ष रहे। सन 1946 -47 में नोआखली जहाँ जबरदस्त दंगे भड़के थे, ठक्कर बापा वहाँ गांधी जी के साथ थे।
स्वतंत्रता के बाद ठक्कर बापा संविधान सभा के लिए चुने गए थे। वे संविधान सभा के और कुछ उप-समितियों में थे। आप गांधी नॅशनल मेमोरियल फण्ड के ट्रस्टी और एक्जुटिव बॉडी के मेंबर थे। ऐसी निर्लिप्त भाव से सेवा करने वाली शख्सियत 20 जनवरी 1951 हम और आप से विदा लेती है।
*लांसनायक करम सिंह*
(भारतीय सेना में लांस नायक एवं परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले प्रथम जीवित अधिकारी)
*जन्म : 15 सितम्बर 1915*
(सेहना, बरनाला, पंजाब, भारत)
*देहांत : 20 जनवरी 1993 (उम्र 77)*
निष्ठा : ब्रिटिश भारत, भारत
सेवा/शाखा : ब्रिटिश भारतीय सेना, भारतीय सेना
सेवा वर्ष : 1941–1969
उपाधि : लांस नायक, बाद में मानद कैप्टन
सेवा संख्यांक : 22356
दस्ता : प्रथम बटालियन (1सिख)
युद्ध/झड़पें : द्वितीय विश्व युद्ध,
भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947
सम्मान : परम वीर चक्र, मिलिट्री मैडल (एमएम)
लांस नायक करम सिंह (बाद में सूबेदार एवं मानद कैप्टन) (15 सितम्बर 1915 - 20 जनवरी 1993), परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले प्रथम जीवित भारतीय सैनिक थे। श्री सिंह 1941 में सेना में शामिल हुए थे और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा की ओर से भाग लिया था जिसमे उल्लेखनीय योगदान के कारण उन्हें ब्रिटिश भारत द्वारा मिलिट्री मैडल (एमएम) दिया गया। उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947 में भी लड़ा था जिसमे टिथवाल के दक्षिण में स्थित रीछमार गली में एक अग्रेषित्त पोस्ट को बचाने में उनकी सराहनीय भूमिका के लिए सन 1948 में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
वह 1947 में आजादी के बाद पहली बार भारतीय ध्वज को उठाने के लिए चुने गए पांच सैनिकों में से एक थे। श्री सिंह बाद में सूबेदार के पद पर पहुंचे और सितंबर 1969 में उनकी सेवानिवृत्ति से पहले उन्हें मानद कैप्टन का दर्जा मिला।
💁🏻♂️ *प्रारम्भिक जीवन*
श्री करम सिंह का जन्म 15 सितंबर 1915 को ब्रिटिश भारत के पंजाब में बरनाला जिले के सेहना गांव में एक सिख जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता उत्तम सिंह एक किसान थे। श्री सिंह भी एक किसान बनना चाहते थे, लेकिन उन्होंने अपने गांव के प्रथम विश्व युद्ध के दिग्गजों की कहानियों से प्रेरित होने के बाद सेना में शामिल होने का फैसला किया। 1941 में अपने गांव में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद वह सेना में शामिल हो गए।
💂♂️ *सैन्य जीवन*
15 सितम्बर 1941 को उन्होंने सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन में दाखिला लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बर्मा अभियान के दौरान एडमिन बॉक्स की लड़ाई में उनके आचरण और साहस के लिए उन्हें मिलिट्री मैडल से सम्मानित किया गया था। एक युवा, युद्ध-सुसज्जित सिपाही के रूप में उन्होंने अपनी बटालियन में साथी सैनिकों से सम्मान अर्जित किया।
💥 *भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947*
1947 में भारत की आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान ने कश्मीरी रियासत के लिए लड़ाई लड़ी। संघर्ष के प्रारंभिक चरणों के दौरान पाकिस्तान के पश्तून आदिवासी सैन्य टुकड़ियों ने राज्य की सीमा पार कर दी तथा टिथवाल सहित कई गांवों पर कब्जा कर लिया। कुपवाड़ा सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर स्थित यह गांव भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। 23 मई 1948 को भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों से टिथवाल पर से कब्जा वापस ले लिया लेकिन पाकिस्तानी सेना ने क्षेत्र को फिर से प्राप्त करने के लिए एक त्वरित हमले शुरू कर दिए। पाकिस्तानी हमले के दौरान भारतीय सैनिक जो उस हमले का सामना करने में असमर्थ थे अपने स्थिति से वापस टिथवाल रिज तक चले गए और उपयुक्त पल के लिए तैयारी करने लगे।
चूंकि टिथवाल की लड़ाई कई महीनों तक जारी रही, पाकिस्तानियों ने हताश होकर 13 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर हमले शुरू कर दिए ताकि भारतीयों को उनकी स्थिति से हटाया जा सके। उनका प्राथमिक उद्देश्य टिथवाल के दक्षिण में स्थित रीछमार गली और टिथवाल के पूर्व नस्तचूर दर्रे पर कब्जा करना था। 13 अक्टूबर की रात को रीछमार गली पर भयानक लड़ाई के दौरान लांस नायक करम सिंह 1 सिख की अग्रिम टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। लगातार पाकिस्तानी गोलीबारी में श्री सिंह ने घायल होते हुए भी साहस नहीं खोया और एक और सैनिक की सहायता से वह दो घायल हुए सैनिकों को साथ लेकर आए थे। युद्ध के दौरान श्री सिंह एक स्थिति से दूसरी स्थिति पर जाते रहे और जवानों का मनोबल बढ़ाते हुए ग्रेनेड फेंकते रहे। दो बार घायल होने के बावजूद उन्होंने निकासी से इनकार कर दिया और पहली पंक्ति की लड़ाई को जारी रखा। पाकिस्तान की ओर से पांचवें हमले के दौरान दो पाकिस्तानी सैनिक श्री सिंह के करीब आ गए। मौका देखते ही श्री सिंह खाई से बाहर उनपर कूद पड़े और संगीन (बैनट) से उनका वध कर दिया जिससे पाकिस्तानी काफी हताश हो गए। इसके बाद उन्होंने तीन और हमलों को नाकाम किया और सफलतापूर्वक दुश्मन को पीछे हटा दिया।
📜 *सम्मान*
लांस नायक करम सिंह को भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947 के दौरान उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस 1950 के दिन परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
जागरूक मतदार, लोकशाहीचा आधार
*बॕरिस्टर नाथ बापू पै*
(स्वातंत्र्य सैनिक)
*जन्म : 25 सप्टेंबर 1922*
वेंगुर्ला , भारत
*मृत्यू : 18 जानेवारी 1971*
(वय 48)
राजकीय पक्ष : प्रजा सोशलिस्ट
पार्टी
खासदार, लोकसभा : 1957–
1971
मतदार संघ : राजापूर
नाथ बापू पै हे स्वातंत्र्य सैनिक, संसदपटू आणि निष्णात घटनातज्ञ. जन्म वेंगुर्ले येथे. तेथेच प्राथमिक शिक्षण. बेळगावच्या लिंगराज कॉलेजमधून अर्थशास्त्र घेऊन बी. ए. (१९४७). नंतर लंडनच्या लिंकन्स इनमधून बार अट लॉ (१९५५). त्यांचे वडील लहानपणीच वारले. आई तापी आणि वडीलबंधू अनंत (भाई) यांच्या संस्कारांचा नाथांच्या व्यक्तिमत्त्वाच्या घडणीत मोठा वाटा होता. संस्कृत, मराठी, इंग्रजी या भाषांवर त्यांनी लहानपणीच प्रभुत्व मिळविले व वक्तृत्व गुणाचाही परिपोष केला. विल्यम शेक्सपिअर, पर्सी शेली, जॉर्ज बायरन इत्यादींच्या साहित्याचे आणि विदग्ध संस्कृत वाङ्मयाचे परिशीलनही त्यांनी केले होते. १९६० साली क्रिस्टल मिशेल या ऑस्ट्रियन युवतीशी त्यांनी विवाह केला. त्या सध्या व्हिएन्ना येथे भारत सरकारच्या परराष्ट्र विभागात काम करतात. महाविद्यालयात असतानाच त्यांनी स्वातंत्र्य चळवळीत भाग घेण्यास सुरुवात केली.
तत्कालीन भूमिगत चळवळींमध्ये त्यांचा मोठा वाटा होता. टपाल-कचेऱ्या लुटणे, पोलीस-कचेऱ्यांवर हल्ला करणे इ. कारणांसाठी त्यांच्यावर त्यावेळी खटले भरण्यात आले. तुरुंगातील बेदम मारामुळे त्यांच्या हृदयावर विपरीत परिणाम झाला. १९४६ च्या प्राथमिक शिक्षकांच्या संपात, तसेच गोवामुक्ती आंदोलनात ते सहभागी झाले. १९४७ साली ते इंग्लंडला गेले. तेथील इंटरनॅशनल नाथ पै युनियन ऑफ सोशॅलिस्ट यूथचे ते सहा वर्षे अध्यक्ष होते. मजूर पक्षाच्या कामगार संघटनांतून काम करीत असताना फ्रेनर ब्रॉक्वे, रेजिनल्ड सरेनसन इ. मजूर नेत्यांशी त्यांचा निकटचा संबंध आला. गोवामुक्तीसाठी रोममध्ये पोर्तुगीज वकिलातीसमोर त्यांच्या नेतृत्वाखाली जोरदार निदर्शने करण्यात आली होती. ज्ञानसंपन्नत्ता व अखंड व्यासंगीवृत्ती तसेच गरिबांविषयीची कळकळ, हे त्यांचे स्थायीभाव होते. बेळगावच्या प्रश्नावर त्यांनी सतत लढा दिला. साराबंदी चळवळीत प्रामुख्याने भाग घेतले (१९६०). त्याच वर्षीच्या सरकारी नोकरांच्या संपाचे ते प्रमुख होते. त्यात त्यांना अटक झाली.
लोकसभेत त्यांचा स्पष्टवक्तेपणा, निर्भयपणा व चिकित्सक अभ्यास हे गुण दिसून येत. सुसंस्कृत राजकारणी (जंटलमन पोलिटिशिअन) अशा शब्दांत पं. नेहरूंनी त्याचा गौरव केला आहे. जगातील अनेक राष्ट्रांच्या राज्यघटनांचा त्यांचा सखोल अभ्यास होता. गोलकनाथ प्रकरणात सर्वोच्च न्यायालयाच्या निर्णयाविरुद्ध लोकसभेत त्यांनी घटनादुरुस्ती विधेयक मांडले. ‘ज्या घटनेत दुरुस्ती होऊ शकत नाही, ती मृतवत होय’, असे त्यांनी ठणकावून सांगितले. त्यांच्या या विधेयकाची राष्ट्रीय पातळीवर चर्चा झाली. रोजगारी हा मूलभूत हक्क आहे आणि तो देता येत नसेल, तर सरकारने बेकारी भत्ता मंजूर करावा, असेही एक विधेयक त्यांनी मांडले होते. आणि आणीबाणीत न्यायालयात दाद मागता येत नाही, म्हणून घटनेतील त्या संबंधीचे ३५९ वे कलम रद्द करावे, असेही विधेयक त्यांनी मांडले. आपली वाणी व बुद्धी त्यांनी जनहितासाठी राबविली. शासनसत्तेचे अधिष्ठान तत्त्वतः लोकशक्तीत असते, अशी त्यांची धारणा होती. कोकण रेल्वे व कोकण विकासासाठी ते आयुष्यभर झगडले.
१९७० मध्ये महाबळेश्वर येथे झालेल्या मराठी साहित्य संमेलनाचे ते उद्घाटक होते. चेकोस्लोव्हाकिया व हंगेरी या देशांतील रशियन सैनिकी कारवायांविरुद्ध लोकसभेत त्यांनी केलेली भाषणे उल्लेखनीय आहेत (१९५६). अशी त्यांची अत्यंत महत्त्वाची निवडक भाषणे लोकशाहीची आराधना (१९७२) या पुस्तकात संग्रहीत केलेली आहेत. हुतात्म्यांना श्रद्धांजली वाहण्यासाठी १७ जानेवारी १९७१ रोजी ते बेळगावला गेले. तेथील सभेत भाषण झाल्यावर हृदयविकाराने त्यांचे आकस्मिक निधन झाले.
देशभरातील एकूण ३११ रिक्त पदे भरली जाणार आहेत.
रेल्वेत स्थिर व प्रतिष्ठेची नोकरी मिळवू इच्छिणाऱ्या उमेदवारांसाठी ही अत्यंत महत्वाची संधी आहे. या भरतीसाठी अर्ज प्रक्रिया ही 30 डिसेंबर 2025 पासून सुरू झाली असून शेवटची तारीख 29 जानेवारी 2026 आहे.
तरी इच्छुक उमेदवारांना https://www.rrbapply.gov.in/ या अधिकृत वेबसाईटवर अर्ज करू शकतात.
पदांची माहिती
वरिष्ठ प्रसिद्ध निरीक्षक: 15
प्रयोगशाळा सहाय्यक श्रेणी- III (रसायनशास्त्रज्ञ व धातूशास्त्रज्ञ): 39
मुख्य विधी सहाय्यक : 22
कनिष्ठ अनुवादक (हिंदी): 202
कर्मचारी व कल्याण निरीक्षण: 24
सरकारी वकील: 07
वैज्ञानिक सहाय्यक / प्रशिक्षण: 02
एकूण पदे: 311
शैक्षणिक पात्रता
प्रत्येक पदासाठी वेगवेगळी शैक्षणिक पात्रता निर्धारित करण्यात आलेली आहे. उमेदवारांनी अर्ज करण्यापूर्वी अधिकृत जाहिरात (Notification) काळजीपूर्वक वाचणे आवश्यक आहे.
वयोमर्यादा
किमान वय: १८ वर्षे
कमाल वय: ३५ वर्षे
(आरक्षित प्रवर्गासाठी शासन नियमानुसार सलवत लागू)
निवड प्रक्रिया
उमेदवारांची निवड संगणक आधारित चाचणी (CBT) द्वारे केली जाईल.
तसेच अर्ज करण्यापूर्वी लक्षात ठेवा या गोष्टी
https://www.rrbapply.gov.in/ या अधिकृत वेबसाईटला भेट द्या.
बँक ऑफ महाराष्ट्रने पदवीधरांसाठी ६०० शिकाऊ उमेदवारांची (Apprentices) भरती जाहीर केली आहे. या भरतीचे वैशिष्ट्य म्हणजे उमेदवारांची निवड कोणत्याही लेखी परीक्षेविना, केवळ गुणवत्तेच्या आधारावर केली जाणार आहे.
बँक ऑफ महाराष्ट्र (Bank of Maharashtra) ने तब्बल ६०० शिकाऊ उमेदवारांची (Apprentices) भरती जाहीर केली आहे. विशेष म्हणजे, या भरतीसाठी कोणतीही लेखी परीक्षा घेतली जाणार नाही.
उमेदवारांची निवड ही कोणत्याही कठीण परीक्षेविना, केवळ 'गुणवत्तेच्या' (Merit) आधारावर केली जाणार आहे. पदवीच्या गुणांवर आधारित तुमची निवड होऊ शकते, त्यामुळे जास्तीत जास्त उमेदवारांनी यासाठी अर्ज करण्याचे आवाहन करण्यात आले आहे.
एकूण पदे: ६०० (अप्रेंटिस)
वयोमर्यादा: २० ते २८ वर्षे.
शिक्षण: कोणत्याही शाखेतील पदवी (Graduation) पूर्ण.
महत्त्वाची अट: उमेदवाराला स्थानिक भाषेचे (मराठी) ज्ञान असणे आवश्यक आहे. (१० वी किंवा १२ वी स्थानिक भाषेतून उत्तीर्ण असणे अनिवार्य).
१. बँकेच्या अधिकृत संकेतस्थळाला bankofmaharashtra.in भेट द्या.
२. 'Careers' सेक्शनमध्ये जाऊन 'Apprenticeship' लिंकवर क्लिक करा.
३. नवीन नोंदणी (New Registration) करून लॉग-इन करा.
४. अर्जात विचारलेली सर्व माहिती अचूक भरा.
५. आवश्यक कागदपत्रे, फोटो आणि स्वाक्षरी अपलोड करून फॉर्म सबमिट करा.
६. भविष्यातील संदर्भासाठी अर्जाची प्रिंट काढून ठेवा.
25 जानेवारी 2026 पर्यंत अर्ज करता येणार...
*महादेव गोविंद रानडे*
(भारतीय विद्वान, समाज सुधारक आणि लेखक)
*जन्म : १८ जानेवारी १८४२*
(निफाड, नाशिक, महाराष्ट्र)
*मृत्यू : १६ जानेवारी १९०१*
टोपणनाव: न्यायमुर्ती रानडे.
चळवळ: समाजसुधारणा
संघटना: राष्ट्रिय सामाजिक परीषद
( स्थापना - १८८५)
पत्रकारिता/ लेखन: सुबोध (पत्रीका) , सुधारक (व्रृत्तपत्र).
धर्म: हिंदू
प्रभाव: महात्मा फुले.
वडील: गोविंद रानडे
महादेव गोविंद रानडे हे महाराष्ट्रातील थोर समाजसुधारक होते, तसेच अर्थशास्त्रज्ञ व ब्रिटिश भारतामधील न्यायाधीश होते. इ.स. १८७८ साली पुणे येथे झालेल्या पहिल्या अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलनचे ते अध्यक्षही होते.१८८५ मध्ये मुंबई उच्च न्यायालया चे न्यायमुर्ती म्हनून त्यांची निवड झाली.
न्या.रानडे यांना आधुनिक भारताच्या इतिहासात महाराष्ट्रातील समाजसुधारणा चळवळीत महत्त्वाचे स्थान आहे. शिक्षणाचा प्रसार व्हावा, स्त्रीयांनाही शिक्षण घेता यावे यासाठी मुलींच्या शाळा सुरू केल्या.त्यांनी शिक्षण, समाजसेवा, राजकारण तसेच आर्थिक बाबतीत अमुल्य कार्य केले.
💁♂ *जीवन*
महादेव गोविंद रानडे यांचा जन्म नाशिकमधील निफाड या गावी झाला. त्यांचे प्राथमिक शिक्षण कोल्हापुरात झाले. त्यांना शालेय आयुष्यात विनायक जनार्दन कीर्तने यांची मैत्री लाभली आणि पुढे ती वाढली. लहानपणी माधवराव अबोल आणि काहीसे संथ होते. मात्र त्यांची तीव्र स्मरणशक्ती, सामाजिक भान इतरांच्या लक्षात आले होते. १८५६नंतर ते आणि कीर्तने मुंबईत शिक्षणासाठी आले, एल्फिन्स्टन हायस्कूलमध्ये दाखल झाले. त्यांचे इंग्रजी-संस्कृत भाषांमधील वाचन वाढले. लॅटिनचाही त्यांनी अभ्यास केला. मॅट्रिकच्या परीक्षेसाठी त्यांनी 'मराठेशाहीचा उदय आणि उत्कर्ष' या विषयावर निबंध लिहिला. पुढच्या काळात त्यांनी त्याच नावाचे पुस्तक लिहिले. अफाट वाचनाने त्यांची बुद्धी प्रगल्भ झाली होती. त्यामुळे त्यांना शिष्यवृत्ती मिळे; बक्षिसेही मिळत. १८६२(?) साली ते मॅट्रिक तर १८६४ साली एम. ए. झाले. त्या वेळी अलेक्झांडर ग्रॅन्ट यांचा सहवास आणि मार्गदर्शन त्यांना लाभले. या काळात माधवरावांनी विविध विषयांवर निबंधलेखन केले. इतिहास आणि अर्थशास्त्र हे त्यांचे आवडीचे विषय राहिले आणि त्यात त्यांनी अधिकारही प्राप्त केला होता. त्यांनी अध्यापन, परीक्षण, अनुवाद, न्यायदान अशा कामांमध्ये आपल्या बुद्धीची चमक दाखवली. त्यांनी इतिहास हा विषय घेऊन एम. ए. केले. इ.स. १८६६ साली ते कायद्याची परीक्षा उत्तीर्ण झाले. मुंबई विद्यापीठाचे पहिले भारतीय फेलो म्हणून त्यांची निवड झाली.
न्यायमूर्ती रानडे यांना एल्फिन्स्टन महाविद्यालयात कनिष्ठ असलेले दिनशा वाच्छा रानडे यांबद्दल लिहितात :-
“ते महाविद्यालयाच्या वाचनालयात अभ्यास करण्यांत कसे रमून जात ते मला नीट स्मरतं. महाविद्यालयाचा अभ्यास शिष्यवृत्तीसाठीच्या परीक्षेसाठी तयारी करणं तर त्यांना मुलांच्या खेळासारखे वाटे. कठीणात कठीण पुस्तक ते इतक्या सहजगत्या समजून घेत असत आणि ज्ञान प्राप्त करत. ज्ञान प्राप्तीची अहमनीय उत्कंठा आणि पुस्तकाच्या विषयाला हृदयंगम करण्याची क्षमता इतकी महान होती की ते दिवसभर पुस्तक वाचत असत. ते पुस्तके वारंवार वाचत. एवढा विस्तृत अभ्यास करायला आमच्यापैकी कुणातही ना धैर्य होतं ना शक्ती, ना एवढी उत्कंठा! ते वाचण्यात एवढे तल्लीन होऊन जात की आजूबाजूला काय चालले आहे याकडे त्यांचे लक्षही जात नसे. खाण्यापिण्याकडे किंवा कपड्याकडे त्यांनी कधीही चौकसपणे लक्ष दिले नाही. काहीही खात, काहीही कपडे घालत.”
👫🏻 *विवाह*
म.गो. रानडे यांचा पहिला विवाह १८५१ साली वयाच्या ११-१२व्या वर्षी वाईतील दांडेकरांच्या रमा नावाच्या मुलीशी झाला. ही पत्नी आजारी पडली आणि तिचे १८७३ साली निधन झाले. माधवरावांचे विधवांच्या पुनर्विवाहासंबंधीचे विचार आणि त्या चळवळीतील त्यांचा सहभाग लक्षात घेता ते एखाद्या विधवेशी लग्न करतील अशी अटकळ त्यांच्या वडिलांनी बांधली आणि त्या सालच्या नोव्हेंबरच्या ३० तारखेला अण्णासाहेब कुर्लेकर यांच्या कन्येशी त्यांनी माधवरावांचा विवाह करून दिला. लग्नानंतर माधवरावांनी या पत्नीचे नावही रमा असेच ठेवले. माधवरावांची त्या काळात 'बोलके सुधारक' म्हणून सनातन्यांकडून संभावनाही झाली. विधवाविवाहाची हाती आलेली संधी आपण दवडली म्हणून ते दु:खी झाले, पण पुढे त्यांनी रमाबाईंना शिकवले.
⚖ *न्यायाधीशी*
काही काळ त्यांनी शिक्षक, संस्थानाचे सचिव, जिल्हा न्यायाधीश म्हणून विविध ठिकाणी काम केले. इ.स. १८९३ साली मुंबई उच्च न्यायालयाचे न्यायाधीश म्हणून त्यांची नेमणूक करण्यात आली.
⚜ *सार्वजनिक कार्य*
ज्ञानप्रसारक सभा, परमहंस सभा, प्रार्थना समाज, सार्वजनिक सभा, भारतीय सामाजिक परिषद इत्यादी विविध संस्था स्थापन करण्यात व त्यांचा विस्तार करण्यात त्यांचा प्रमुख सहभाग होता. ‘अनेक क्षेत्रांतील संस्था स्थापन करून त्यांनी भारतात संस्थात्मक जीवनाचा पाया घातला,’ असे त्यांच्याबद्दल गौरवाने म्हटले जाते. रानडे यांनी स्वातंत्र्यासाठी व सामाजिक सुधारणांसाठी कायम घटनात्मक व सनदशीर मार्गांचा पुरस्कार केला. स्वातंत्र्यपूर्व काळातील ‘मवाळ’ प्रवाहाचे ते नेते होते. त्यांनी भारतीय राजकारणात अर्थशास्त्रीय विचार आणला. स्वदेशीच्या कल्पनेला त्यांनी शास्त्रशुद्ध व व्यावहारिक स्वरूप दिले. त्यांनी भारतातील दारिद्ऱ्याच्या प्रश्नाचे मूलभूत विवेचन करून येथील दारिद्ऱ्याची कारणे व ते दूर करण्याचे उपाय यासंबंधी अभ्यासपूर्ण विचार मांडले.
भारतीय समाजात संकुचित वृत्ती; जातिभेदांचे पालन; भौतिक सुखे, व्यावसायिकता व व्यावहारिकता यांविषयाचे गैरसमज यांसारखे दोष निर्माण झाल्यामुळे समाजाची मोठ्या प्रमाणात हानी झाली आहे. हे दोष दूर करूनच आपल्या समाजाची प्रगती साधता येईल असे त्यांचे ठाम मत होते. समाजाची राजकीय किंवा आर्थिक उन्नती घडवून आणायची असेल, तर सामाजिक सुधारणेकडे लक्ष पुरविले पाहिजे. "ज्याप्रमाणे गुलाबाचे सौंदर्य व सुगंध हे जसे वेगळे करता येत नाहीत, त्याप्रमाणे राजकारण व सामाजिक सुधारणा यांची फारकत करता येत नाही" असे त्यांचे मत होते. हे विचार त्यांनी समाजसुधारणा चळवळीच्या अगदी सुरुवातीच्या काळात मांडल्यामुळे त्यांना ‘भारतीय उदारमतवादाचे उद्गाते’, असेही म्हटले जाते.
🏦 *संस्था*
दिनांक ३१ मार्च, इ.स. १८६७ रोजी न्यायमूर्ती रानडे, डॉ. आत्माराम पांडुरंग, डॉ. रा. गो. भांडारकर, वामन आबाजी मोडक इत्यादी मंडळींनी पुढाकार घेऊन मुंबईत ‘प्रार्थना समाजा’ची स्थापना केली. त्याआधी इ.स. १८७१ साली रानडे यांचा सार्वजनिक सभेच्या स्थापनेशी व कार्याशी संबंध आला होताच. सामाजिक प्रश्नांचे महत्त्व लक्षात घेऊन, समाजसुधारणांसाठी रानडे यांनी पुढाकार घेऊन ‘भारतीय सामाजिक परिषदेची' स्थापना केली. या परिषदेचे ते १४ वर्षे महासचिव होते. जातिप्रथेचे उच्चाटन, आंतरजातीय विवाहांस परवानगी, विवाहाच्या वयोमर्यादेत वाढ, बहुपत्नीकत्वाच्या प्रथेस आळा, विधवा पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षण, तथाकथित जाति-बहिष्कृत लोकांच्या स्थितीत सुधारणा, हिंदू-मुसलमानांच्या धार्मिक मतभेदांचे निराकरण अशा या संस्थेच्या मागण्या होत्या. भारताच्या स्वातंत्र्यात पुढे मध्यवर्ती भूमिका बजावणाऱ्या ‘राष्ट्रीय काँग्रेस’ या संघटनेच्या स्थापनेतही (इ.स. १८८५) न्यायमूर्ती रानडे यांचा मोठा सहभाग होता.
न्यायमूर्ती रानडे यांनी वक्तृत्वोत्तेजक सभा (हीच संस्था पुणे शहरात दरवर्षी, वसंत व्याख्यानमाला आयोजित करते), नेटिव्ह जनरल लायब्ररी, फीमेल हायस्कूल, मुलींच्या शिक्षणासाठी हुजूरपागा शाळा, इंडस्ट्रियल असोसिएशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया, इत्यादी अनेक संस्था पुढाकार घेऊन स्थापन केल्या. मराठी ग्रंथकार संमेलन सर्वप्रथम त्यांच्याच प्रयत्नांमुळे यशस्वी ठरले होते. त्यातूनच पुढे साहित्य संमेलन योजण्याची प्रथा सुरू झाली. न्यायमूर्ती रानडे हे स्वतः उत्तम संशोधक, विश्लेषक होते हे त्यांच्या द राइझ ऑफ मराठा पॉवर (मराठी सत्तेचा उदय) या ग्रंथावरून दिसून येते. त्यांच्या व्याख्यानांचे संग्रहही पुढील काळात प्रकाशित झाले.
⛲ *लोकांचा रोष*
विष्णुबुवा ब्रह्मचारी, करसनदास मुलजी, भाऊ दाजी, रावसाहेब मंडलिक, विष्णुशास्त्री पंडित, सार्वजनिक काका आणि पंडिता रमाबाई यांच्या बरोबरीने आणि सहकार्याने माधवरावांनी विधवांच्या पुनर्विवाहाचा प्रश्न, संमतीवयाचा कायदा यांसारख्या अनेक समाजसुधारणांकरिता अथक प्रयत्न केले. परंतु स्वामी दयानंद सरस्वती, वासुदेव बळवंत फडके, पंचहौद मिशन, रखमाबाई खटला या व्यक्ती वा घटनांच्या संदर्भांत त्यांना टीका सहन करावी लागली. त्या काळात समाजसुधारकांना फार विरोध होई. माधवरावांच्या या समाजसुधारकी कामालाही सनातनी वर्गाकडून सतत विरोध झाला. माधवरावांनी तो विरोध सहनशीलतेने आणि समजुतीने हाताळला.
💎 *सरकारी रोष*
माधवरावांच्या समाजकारणाच्या प्रारंभी अलेक्झांडर ग्रॅन्ट, सर बार्टल फ्रियर, बेडरबर्न यांच्या काळातील सरकारचा विश्वास त्यांनी अनुभवला. पण पुढे क्रांतिकारकांचे, पेंढाऱ्यांचे बंड, दुष्काळ आणि तत्कालीन सरकारविरोधी घटनांत माधवरावांचा हात असल्याचा संशय सरकारला येऊ लागला. त्याचा परिणाम म्हणून त्यांची बदली १८७९ साली धुळे येथे झाली आणि त्याचबरोबर त्यांच्या टपालावर नजर ठेवण्यात येऊ लागली. म्हणून गणेशशास्त्री लेले या मित्राने त्यांना नोकरीतून निवृत्ती स्वीकारण्याचा सल्ला दिला. माधवरांवांनी हा सल्ला मानला नाही, आणि पुढे यथावकाश सरकारचा संशय दूर झाला.
🏢 *मुंबई विद्यापीठात मराठी भाषेसाठी प्रयत्न*
🌀 *पार्श्वभूमी*
ईस्ट इंडिया कंपनीच्या संचालकांनी त्या त्या प्रांतातील शिक्षणाची व्यवस्था लावण्यासाठी १८४०मध्ये प्रांतनिहाय शिक्षणमंडळे (बोर्ड ऑफ एज्युकेशन) स्थापन केली. त्यांपैकी मुंबई प्रांताच्या शिक्षणमंडळाचे अध्यक्ष सर आर्स्किन पेरी ह्यांनी मंडळाच्या सभेत "उच्च शिक्षण देणाऱ्या सर्व संस्थांत शिक्षणाचे माध्यम केवळ इंग्लिश हेच असेल" असा ठराव मांडला. (त्यावेळी महाविद्यालये अथवा विद्यापीठ नसल्याने उच्चशिक्षण ह्या संज्ञेचा अर्थ माध्यमिक शाळांतील शिक्षण असा होता. ह्या ठरावाला तीन भारतीय सदस्य आणि कर्नल जार्विस ह्यांनी विरोध केला. त्यामुळे पेरी ह्यांचा ठराव लगेच मान्य झाला नाही. परंतु कलकत्ता येथील वरिष्ठ अधिकाऱ्यांनी तो मान्य केल्यामुळे मुंबई प्रांतातील सर्व माध्यमिक शाळांतून (तत्कालीन चवथी ते सातवी (मॅट्रिक)) ह्या वर्गांत मराठी भाषा वगळता अन्य सर्व विषय मातृभाषेऐवजी इंग्लिशमधून शिकवण्यात येऊ लागले.
चार्ल्स वुड ह्यांच्या मार्गदर्शनानुसार मुंबई प्रांतातील शिक्षणविषयक व्यवस्थापनाची एक संहिता १८५४ मध्ये तयार करण्यात आली. तिच्यातील एका कलमात शिक्षणव्यवस्थेत देशी भाषांना उत्तेजन देण्याचे कलम असले तरी त्यावर प्रत्यक्षात कार्यवाही झाली नव्हती.
१८५७ ह्या वर्षी मुंबई विद्यापीठ स्थापन झाले तेव्हा मराठी हा विषय मॅट्रिक ते एम. ए.पर्यंतच्या सर्व परीक्षांना वैकल्पिक म्हणून घेण्याची सोय होती. पण १८५९ ह्या वर्षी झालेल्या विद्यापीठाच्या पहिल्या मॅट्रिक परीक्षेत मुंबई प्रांतातून परीक्षेला बसलेल्या १३२ विद्यार्थ्यांपैकी केवळ २२ विद्यार्थी उत्तीर्ण झाले आणि अनुत्तीर्ण झालेल्या ११० विद्यार्थ्यांपैकी ८९ विद्यार्थी हे मराठी इ. देशी भाषांत अनुत्तीर्ण झाले होते. ह्या प्रकाराची पुनरावृत्ती १८६२ पर्यंत होत राहिल्याने २९ नोव्हेंबर १८६२ रोजी विद्यापीठाच्या कार्यकारी मंडळापुढे (सिंडिकेट) विद्यापीठाचे कुलगुरू सर अलेक्झँडर ग्रँट ह्यांनी मॅट्रिक्युलेशननंतर विद्यापीठात केवळ अभिजात भाषाच (उदा. संस्कृत, अरबी, हीब्रू, ग्रीक, लॅटिन) शिकवण्यात याव्यात असा ठराव मांडला. ह्या ठरावाला डॉ. एम. मरे आणि डॉ. जॉन विल्सन ह्यांनी विरोध केला. पण हा ठराव १८६३मध्ये मान्य झाला. त्यामुळे मॅट्रिक ते एम. ए. ह्या सर्व स्तरावर मराठी भाषेचे अध्ययन-अध्यापन बंद झाले.
🔮 *रानडे ह्यांचे प्रयत्न*
१८७० ते १८८७ ह्या काळात मराठीला विद्यापीठात स्थान मिळावे ह्यासाठी जनमत तयार करण्यासाठी रानडे ह्यांनी प्रयत्न केले.
'विद्यापीठ आणि देशी भाषा' ह्या विषयावर श्री. ग. त्र्यं. जोशी ह्यांना निबंध लिहिण्यास प्रवृत्त करून त्या निबंधाचे सार्वजनिक सभेत प्रकट वाचन करवणे व चर्चा करणे
जर्नल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसायटी ह्या संस्थेच्या नियतकालिकातून ह्या विषयावर लेखन
मुंबईच्या टाइम्स ऑफ इंडिया ह्या वृत्त पत्रातून ह्या विषयावर लेखन
तसेच देशी भाषांत प्रकाशित होणाऱ्या पुस्तकांचा आढावा घेण्यासाठी मुंबईच्या शासनाने नेमलेल्या रजिष्ट्रार ऑफ नेटिव्ह पब्लिकेशन्स ह्या अघिकाऱ्याशी संपर्क साधून त्या वर्षीच्या अहवालात देशी भाषांत पुस्तके प्रकाशित होण्याचे प्रमाण कमी असण्याचे कारण विद्यापीठात ह्या भाषांना स्थान नसणे हे असल्याचे रानडे ह्यांनी नोंदवून घेतले. ह्यावर तत्कालीन भारतमंत्र्यांनी मुंबईच्या गव्हर्नरांना ह्या प्रकरणी लक्ष घालण्याची सूचना केल्याने विद्यापीठाच्या कार्यकारी सभेत (सिंडिकेट) ह्या विषयावर चर्चा झाली. रानडे ह्यांच्या प्रयत्नांना यश आले नाही.
१८९७ ह्या वर्षी रानडे ह्यांनी मराठी आणि इतर देशी भाषा ह्यांच्या पुरस्कर्त्यांच्या सह्यांसह पुन्हा एक अर्ज कार्यकारी सभेपुढे मांडला. पण त्यावर चर्चा होऊन ती अनिर्णित राहिली. रानडे ह्यांनी विद्यापीठाच्या फॅकल्टी ऑफ आर्ट ह्या मंडळापुढे तो ठराव मांडण्याचा प्रयत्न केला पण त्यालाही पाठिंबा मिळाला नाही.
१९०० ह्या वर्षी मुंबई प्रांताच्या शिक्षणसंचालकांनी ह्या प्रश्नी विद्यापीठाला पत्र लिहून विचार करण्याची सूचना केली असता बी. ए. आणि एम. ए. ह्या परीक्षांना नेमण्यासाठी देशी भाषांतील पुस्तके सुचवण्यासाठी समिती नेमण्यात आली. समितीने मराठीतील अशा पुस्तकांची यादी सादर केल्यावर २९ जानेवारी १९०१ ह्या दिवशी (रानडे ह्यांच्या मृत्यूनंतरच्या १३ व्या दिवशी) सिनेटच्या बैठकीत विद्यापीठाच्या परीक्षांत देशी भाषांचा समावेश करण्याचा प्रस्ताव मांडण्यात आला. हा प्रस्ताव मांडणारे सदस्य चिमणलाल सेटलवाड ह्यांनी रानडे ह्यांच्या निधनाने झालेल्या हानीचा उल्लेख करून सदर प्रस्तावासंदर्भात रानडे आणि आपण ह्यांच्यात झालेल्या संभाषणाचा उल्लेखही केला. ह्या सभेत हा प्रस्ताव बहुमताने संमत करण्यात आला. त्यायोगे मॅट्रिकप्रमाणे एम.ए.च्या परीक्षेतही मराठी हा विषय विकल्पाने उपलब्ध करून देण्यात आला. मात्र मराठीची प्रश्न पत्रिका इंग्लिशमधून काढण्यात येणार होती आणि उत्तरेही इंग्लिशमध्येच देण्याची अट होती.
⏳ *निधन*
रानडे यांनी १६ जानेवारी १९०१च्या रात्री जस्टीन मेकार्थी याचे ‘हिस्ट्री ऑफ अवर ओन टाईम्स’ हे पुस्तक वाचायला घेतले आणि पुस्तक वाचायला बसले नाहीत तोवर त्यांना त्रास सुरु झाला व त्यांची जीवनयात्रा संपली.
📚 *म.गो. रानडे यांनी लिहिलेली किंवा ?*त्यांच्यासंबंधी लिहिली गेलेली पुस्तके*
न्या. म. गो. रानडे व्यक्ति कार्य आणि कर्तृत्व (१९९२-त्र्यंबक कृष्ण टोपे)
मराठेशाहीचा उदय आणि उत्कर्ष (१९६४-म.गो. रानडे)
पुनरुत्थानाचे अग्रदूत - म.गो. तथा माधवराव रानडे यांचे चरित्र (२०१३-ह.अ. भावे)
आमच्या आयुष्यातील काही आठवणी (१९१०-रमाबाई रानडे)
न्यायमूर्ती महादेव गोविंद रानडे चरित्र (१९२४-न.र. फाटक)
रानडे-प्रबोधन पुरुष (२००४-डॉ. अरुण टिकेकर)
Mahadev Govind Ranade (इंग्रजी १९६३-टी.व्ही. पर्वते)
Mr. Justice M. G. Ranade : A Sketch of the Life and Work. (इंग्रजी-जी.ए.मानकर).
Ranade : The Prophet of Liberated India (इंग्रजी १९४२-डी.जी. कर्वे).
मन्वंतर - (२००९-गंगाधर गाडगीळ)
Mahadev Govind Ranade : A Biography Of His Vision And Ideas (इंग्रजी १९९८-वेरिंदर ग्रोवर)
१४ जानेवारी - डॉ. सी. डी. देशपांडे यांच्या स्मृतीप्रित्यर्थ
महाराष्ट्र लोकसेवा आयोगा (एमपीएससी) मार्फत महाराष्ट्र गट-ब (अराजपत्रित) सेवा संयुक्त भरती २०२६ ची बहूप्रतीक्षित जाहिरात अखेर प्रसिद्ध झाली...